Saturday, 6 September 2014

प्रतिशोध (अंश 5)

नोट: यह एक चल रही कहानी का पाँचवा अंश है पिछले अंश पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ:-अंश4अंश 3अंश 2अंश 1

जब मन आवारा हो जाता है और उसपर से दुनिया भर की जिम्मेदारियों का बोझ हट जाता है तो वह उछालें मारने लगता है; तरह-तरह के तिलिस्म उसे घेर लेते हैं और उसके साथ रास करने लगते हैं. ऐसा ही कुछ बड़े भाई के साथ हुआ. एक पल में सर से माँ-बाप दोनों का साया उठ जाने से वह आवारा हो चला था. अब छोटे भाई की ज़िम्मेदारियाँ उसपर ना थीं तो दुनिया के सारे अनूठे कृत्य उसे लुभाने लगे.  वह मदिरा पान करने लगा, जुआँ-दारू तो अब उसके साथी हो चले थे. आलम ये हुआ कि जो घर कभी संस्कारों की मूर्ती सा मालूम होता था वह अब जुआड़ियों और दारूखोरों का अड्डा बन गया. बड़ा भाई दिन भर नशे में धुत्त अपनी मदमस्त ज़िन्दगी गुजरने लगा. शायद अब वह भूल ही चुका था कि उसका कोई छोटा भाई भी इस दुनिया में जीवित है.

किसी रोज़ जब सुबह के सात बज रहे थे और बड़े भाई के घर में जुआड़ी तथा दारूखोर जमना शुरू ही हुए थे कि एक पन्सारी दौड़ता हुआ उस ओर आया. वह बहुत घबराया हुआ था और जोर-जोरसे हाँफी भर रहा था. बड़े भाई के कारण पूछे जाने पर बस यही बोला कि बाबूजी गजब हो गया! "क्या गजब हो गया?! सीधे से क्यों नहीं बोलता?!" बड़े भाई ने गुस्से से पुछा!

"क्या कहूँ बाबूजी हमला हो गया!"

"कहाँ हमला हो गया?"

"बाबूजी उस पार के गाँव के लोगों ने हमला ढा दिया!"

"क्या कहता है होश में तो है?!"

"हाँ बाबूजी नदी तरफ से घुस आये वे लोग और हमला कर दिए!"

"क्या कहता है, नदी तरफ से!!!"

"हाँ बाबूजी, वहीँ से आये हैं!"

बड़ा भाई यह सुनकर स्तब्ध रह गया मानो उसे साँप सूँघ गया हो. जिस चित्र को वह अपने मानस पटल से साफ़ कर चुका था वह क्षण भर में वापस खिंच गया. मुखारबिंद से सारा दारु का नशा उतर गया. बिजली की सी तेज़ रफ़्तार से वह घर के भीतर भाग और वह बंदूक जो अब सज्जा मात्र रह गई थी उसे दीवार से उतार लाया. 'छोटे भाई के प्राण खतरे में हैं', इस विचार ने उसे ऊपर से नीचे तक हिलोर दिया. वह भागता हुआ नदी किनारे पहुँच गया

दृश्य मर्मम निर्दयी था; गेहूँ के साथ घुन भी पिस गया. चमकीली रेत पर इन्सानो के साथ गए-बैलों के भी शव रक्त-लिप्त पड़े हुए थे.किनारे की बस्तियों और दुकानों का कहीं पता ना था; सब आग में जलकर राख हो चुकी थीं. यह दृश्य देखकर बड़े भाई की आत्मा तक काँप गई. मृत्यु का यह भीवत्स रूप अबतक वह बनाना जान पाया था पर उसने अपने जीवन में ये कल्पना नहीं की थी कि यह भीवत्स  दृश्य एक दिन अपने ही घर सज जाएगा. थोड़ी हिम्मत जुटा कर वह शवों को टटोलने लगा, बेहताशा से अपने भाई को खोजने लगा. शवों का मानो समुद्र सा उसके सामने पड़ा था जिसमे से उसे एक ख़ास तरह की बूँद की तलाश थी, हाँ उसके भाई की तलाश. इस असफल परिश्रम में संध्या हो चली थी, पर अब भी उसके छोटे भाई का कोई पता नहीं था. आखिर धैर्य टूट गया, आँखों में अश्रु की जगह खून उतर आया. अपनी बंदूक को अपने हाथों में तेजी से पकड़कर वह अकेला ही उसपार दौड़ पड़ा.

कदमों में थकने का नाम ना था और वे रफ़्तार पर रफ़्तार पकड़ रहे थे. परन्तु अचानक से बड़े भाई के पैर थम गए; कोई कराह रहा था! बड़े भाई ने इधर-उधर देखा तो पाया, नदी अपने पानी से किसी को धकेल रही थी, मानो चाहती हो उसे सोने ना दे. किसी भी तरह कुछ पल और उसे जगाए रखे. बड़ा भाई दौड़कर उसके पास पहुँचा और उसे अपनी गोद में उठा लिया. "भाई तुम गए!" बस इतना कहकर छोटे भाई ने उसकी ही गोद में अपने प्राण त्याग दिए!

आगे की कहानी प्रतिशोध (अंश 6: समापन)